यौन लालसा तृप्ति अमर रस से-2

सारिका कंवल
अब मैंने उसका लिंग हाथ में ले लिया तो मुझे करन्ट सा लगा और मेरी आँखें खुल गईं।
तभी मेरी नजर बिस्तर पर सोये हुए मेरे बच्चे पर गई और मैं रुक गई।
इस पर अमर ने पूछा- क्या हुआ, भयभीत क्यों हो रही हो, मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा जिससे तुम्हें तकलीफ़ हो।
तब मैंने उसे बताया कि क्या बात है। उसने बच्चे को पालने में सुला दिया और फ़िर मेरे पास आ गया।
अब अमर मेरे पास आए और मुस्कुराते हुए कहा- मुझे लगा तुम मेरे लिंग का आकार देख कर भयभीत हो गई..!
और वो जोर-जोर से हँसने लगा। मैंने उसको शान्त किया कि कोई सुन ना ले।
फ़िर मैंने उससे कहा- ऐसी बात नहीं है..!
पर उसके लिंग का आकार को देख कर मुझे जरा भय तो लगा क्योंकी उसका लिंग काफी लम्बा था।
अब हम फ़िर से एक-दूसरे की बांहों में खोकर प्यार करने लगे।
अब तो मैं पूरी तरह से गर्म और गीली हो चुकी थी और अमर के लिंग में भी काफ़ी तनाव आ गया था।
अमर ने मुझसे कहा- सारिका, अब और नहीं रहा जाता, मैं जल्द से जल्द सम्भोग करना चाहता हूँ।
मैंने भी सिर हिला कर उसको इशारे से ‘हाँ’ कह दिया। मेरे अन्दर चिंगारी जल रही थी और मैं भी जल्द शांत होना चाह रही थी।
अब उसने एक तकिया मेरी कमर के नीचे रख दिया और मेरी जाँघों के बीच आ गया और मेरे पैरों को फ़ैला कर मेरे ऊपर लेट गया।
उसका लिंग मेरी योनि से स्पर्श कर रहा था, उसने मुझे अपनी बांहों में कस लिया और मैंने भी उसे जकड़ लिया।
अमर ने मुझसे पूछा- क्या तुम तैयार हो?
मैंने भी हाँ में जवाब दिया। अब अमर अपने लिंग को मेरी योनि में घुसाने की कोशिश करने लगा, पर जब भी वो करता लिंग फ़िसल जाता।
तब उसने मुझे सहयोग करने को कहा। अब मैंने उसके लिंग को हाथ से योनि के ऊपर रखा और अमर से जोर लगाने को कहा।
उसका लिंग मेरी योनि में घुसता चला गया। और मुझे हल्की सा दर्द हुआ, मैं सिसक गई। यह देख कर अमर ने मुझे चूम लिया।

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शायद वो भी जानता था कि यह सुख की सिसकी है और धीरे-धीरे वो जोर लगाता रहा। मैं हर जोर पर सिसक जाती, मुझे तकलीफ़ जरूर हो रही थी, पर वासना के आगे कुछ नहीं दिखता।
मैं बर्दाश्त करती रही, जब तक उसका पूरा लिंग मेरी योनि में समा न गया। मैंने एक दो बार उसको भी देखा, शायद उसे भी तकलीफ़ हो रही थी क्योंकि मेरी योनि उसके लिये तंग लग रही थी।
अब हमने एक-दूसरे को कस लिया और फ़िर उसने एक बार फ़िर जोर लगाया। इस बार उसका समूचा लिंग अन्दर समा गया और मेरी सिसकारी इस बार जरा जोर से निकली।
इस पर अमर बोले- क्या हुआ.. तुम्हें दर्द हो रहा है?
मैंने बस सिर हिला कर ‘ना’ में जवाब देते हुए कहा- अब देर न कीजिए… जल्द मुझे प्यार कीजिए..!
दर्द तो मुझे हो रहा था, पर जानती थी कि कुछ ही पलों में यह गायब हो जायेगा तो मैंने उसे जल्द धक्के लगाने को कहा। उसका लिंग की ठोकर मेरी बच्चेदानी में लग रही थी, जिससे मुझे हल्का दर्द तो हो रहा था, पर उसके गर्म लिंग के सुखद एहसास के आगे ये सब कुछ नहीं था। उसने सम्भोग की प्रकिया को शुरू कर दिया पहले धीरे-धीरे धक्के लगाए, फ़िर उनकी रफ़्तार तेज हो गई।
मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। बहुत मजा आ रहा था। मेरी योनि में जितना अधिक धक्के लगते, उतनी ही गीली हो रही थी। मैं अमर को पूरी ताकत से अपनी बांहों और पैरों से कस चुकी थी और उसने भी मुझे जकड़ा हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों एक-दूसरे में आज समा जायेंगे।
अमर धक्कों के साथ मुझे चूमता चूसता, कभी मेरे स्तनों से दूध पीने लगता और मैं भी उसे उसी तरह चूसने और चूमने लगी। मेरे अन्दर हलचल सी मची थी, मुझे बहुत मजा आ रहा था।
तभी अमर ने कहा- सारिका कैसा लग रहा है, कोई तकलीफ़ तो नहीं हो रही तुम्हें?
मैंने उसकी तरफ़ देखा, उसके सिर से पसीना आ रहा था। मुझे उसके चेहरे पर एक सन्तोष और खुशी नजर आई, जो मेरी वजह से थी। वो हांफ रहा था।
उसने प्यार से मुझे पूछा तो मैंने भी कहा- नहीं कोई तकलीफ़ नहीं है और मुझे बहुत मजा आ रहा है, आप बस रुकना मत।
यह सुन उसने एक धक्का दिया और मुझसे चिपक कर मेरे मुँह से अपने मुँह को लगा दिया। अब अमर धक्के नहीं बल्कि अपने लिंग को मेरी योनि में पूरा घुसा कर अपनी कमर को घुमाने लगा।
हम एक-दूसरे के होंठों और जुबान चूसने लगे, साथ ही अपनी-अपनी कमर घुमाने लगे। मैं समझ गई थी कि अमर थक गया है इसलिए ऐसा कर रहा है पर मुझे यह बहुत अच्छा लग रहा था। उसके लिंग को मैं अपने बच्चेदानी में महसूस कर रही थी, जिससे मुझे एक अलग तरह का मजा आ रहा था। हल्का दर्द होता था, पर वो भी किसी मजे से कम नहीं था इसलिए मैं बस उसका आनन्द लेती रही।
उसकी सांसें जब कुछ सामान्य हुईं, तो फ़िर से धक्के लगाने लगा।
कुछ ही देर में मेरा बदन सख्त होने लगा, तब उसने धक्के लगाने बन्द कर दिए। वो समझ गया कि मैं स्खलित होने वाली हूँ पर शायद वो ऐसा नहीं चाहता था।
तब मैंने उनसे पूछा- क्या हुआ?
उन्होंने मुझसे कहा- इतनी जल्दी नहीं..!
मैं यह भूल गई थी कि उसकी उमर 50 से अधिक है और अनुभव भी।
अब उसने मेरी कमर के नीचे अपने हाथ लगाए और कहा- अब तुम मेरे ऊपर आ जाओ, अपना पैर मेरी कमर से भींचे रखो और लिंग को बाहर न आने देना।
मेरे लिए ये एक अलग तरह का अनुभव था। अब हमने अपनी अवस्था बदली, मैं उसके ऊपर थी, उसी वक्त मेरा ध्यान तकिये पर गया, मेरी योनि से निकले पानी से उसका खोल भीग गया था पर उसे दरकिनार कर अपने सम्भोग में ध्यान लगाने लगी।
मैं अमर के ऊपर लेट गई और उसके सीने पर हाथ रख दिया।
अमर ने मेरी कमर पर हाथ रख दिया और मैं अब धक्के लगाने लगी। हमारी मस्ती अब आसमान में थी। उसके लिंग का स्पर्श मुझे पागल किए जा रहा था। जब उसका लिंग अन्दर-बाहर होता तो मैं उसके लिंग के ऊपर की चर्म को अपनी योनि की दीवारों पर महसूस कर रही थी। कुछ देर के बाद मेरी भी सांसें फूलने लगीं, मैं भी थक गई थी।
अमर इस बात को समझ गए और बोले- सारिका तुम भी अब थक गई हो, अब तुम अपने शरीर को ऊपर करो।
मैंने वैसा ही किया।
अब अमर ने अपने हाथ मेरी कमर पर रखा और कहा- तुम अपनी कमर को ऐसे घुमाओ जैसे अंग्रेजी में 8 लिखते हैं। मानो की तुम अपनी कमर से 8 लिख रही हो।
मैं वैसा ही करने लगी।
सच में क्या गजब का मजा आ रहा था। मेरी बच्चेदानी से जैसे उनका लिंग चिपक गया हो, ऐसा लग रहा था।
करीब दस मिनट तक मैं वैसे ही मजे लेती रही। आखिरकार मेरा सब्र जवाब देने लगा, मेरा शरीर अकड़ने लगा, अब मैं स्खलित होने वाली थी। पर अमर नहीं चाहता था कि मैं अभी स्खलित होऊँ।
इसलिए उसने मुझसे कहा- अभी नहीं.. इतनी जल्दी… हम साथ में होगें, खुद पर काबू करो..!
पर अब मुझसे ये नहीं होने वाला था। उसने मुझे तुरन्त नीचे उतार दिया और अपना लिंग बाहर निकाल दिया।
अब मैं बेकाबू सी होने लगी और उससे विनती करने लगी- अमर प्लीज़, अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता, मैं जल्द से जल्द चरम सुख पा लेना चाहती हूँ…!
अमर ने कहा- इतनी जल्दी नहीं…कुछ देर और करते हैं, जब तक ये न लगे कि हमारा शरीर पूरी तरह आग न बन जाए..!
मैंने दोबारा विनती की- प्लीज़.. अब मैं और इस आग में नहीं जल सकती, मेरी आग को शान्त करो। मैं स्खलित होना चाहती हूँ..!
उसने मेरी विनती सुन ली और अपने लिंग को हाथ से कुछ देर सहलाने के बाद मेरे ऊपर आ गया। अब उसने मेरे पैरों को फ़ैलाया और बीच में आ गया।
मैं तो पहले से ही व्याकुल थी, सो मैंने बिना देर किए, उनके गले में हाथ दे दिया और कस लिया। अपने लिंग को हाथ से मेरी योनि पर रख कर जोर दिया, लिंग अन्दर चला गया।
मैं सिसक गई। फ़िर उसने मुझे चूमा और धक्के लगाने लगा और कहा- सारिका, मैं चाह रहा था कि तुम इस पल को पूरी तरह मजा लो, पर तुम मेरा साथ नहीं दे रही..!
मैंने जवाब दिया- मुझे बहुत मजा आ रहा है, बस अब मैं चरम सुख चाहती हूँ..!
उसने कहा- अगर तुम मुझसे पहले स्खलित हो गई तो मेरा क्या होगा..!
मैंने जवाब दिया- मैं आपका साथ दूँगी, जब तक आप स्खलित नहीं होते..!
यह सुनते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई और धक्कों की गति तेज़ होने लगी।
अब मैं ज्यादा दूर नहीं थी, मेरे मुँह से मादक सिसकारियाँ निकलने लगी थीं। हम दोनों के मुँह आपस में एक हो गए। एक-दूसरे की जुबान से हम खेलने लगे और नीचे हमारे लिंग और योनि का खेल चल रहा था।
मैंने महसूस किया कि अमर का शरीर भी अब सख्त हो रहा है, मैं समझ गई कि अब वो भी चरम सुख से दूर नहीं है।
उसके धक्के लगातार तेज़ और पहले से कहीं अधिक दमदार होते जा रहे थे, उसने अपने शरीर का पूरा जोर मुझ पर लगा दिया और मैंने भी उस पर अपना शरीर चिपका दिया।
हमारी साँसें तेज होने लगीं, हम हांफ़ने लगे थे।
तभी मुझे ख्याल आया कि अमर ने सुरक्षा के तौर पर कुछ नहीं लगाया है।
मैं इससे पहले कुछ कह पाती, मेरे शरीर ने आग उगलना शुरू कर दिया। मैं जोरों से अपनी कमर को ऊपर उछालने लगी, तभी अमर ने भी पूरा जोर मुझ पर लगा दिया।
मैं स्खलित हो गई और कुछ जोरदार धक्कों के बाद अमर भी स्खलित हो गया, उसके गर्म वीर्य को मैंने अपने अन्दर महसूस किया। हम दोनों थक कर ऐसे ही कुछ देर लम्बी सांसें लेते हुए पड़े रहे। कुछ देर बाद अमर मुझसे अलग हुआ, मैंने देखा उनका लिंग सफ़ेद झाग में लिप्त था जो कि रोशनी में चमक रहा था। उसके चेहरे पर सन्तोष और खुशी थी।
उसने अपना लिंग और मेरी योनि को तौलिए से साफ़ किया और मेरे बगल में लेट गया।
हम कुछ देर बातें करते रहे और अब हम खुल कर बातें कर रहे थे।
इसके बाद भी हमने 3 बार सम्भोग किया, पर हम दोनों की हालत ऐसी हो गई थी कि उनके जाने के बाद मैं कब सो गई, कुछ पता ही नहीं चला।
मुझे इतना मजा अया कि मैं उस रात को कभी भूल नहीं सकती।
आपको मेरा अनुभव कैसा लगा, मुझे जरूर लिखिए।
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