मेरी बहू रानी को पुनः भोगने की लालसा- 2 (Meri Bahu Sex ki Diwani)

मेरी बहू मेरे साथ सेक्स की दीवानी है. हम दोनों एक दूसरे के साथ चुदाई के लिए हमेशा लालयित रहते हैं. लम्बे अरसे के बाद मौक़ा मिलने वाला था पर …

बहू सेक्स कहानी के पहले भाग
पुत्रवधू से मिलन की तलब
में अपने पढ़ा कि मैं बहू के मायके की शादी में शामिल होने गया. मेरी बहू भी वहां मिली मुझे. शादी में जाने का मेरा एकमात्र उद्देश्य बहू के साथ सेक्स का मजा लेने का था. लेकिन विवाह की गहमागहमी में हमें मौक़ा नहीं मिल रहा था.
मैं बहुत मायूस हो रहा था. बहू मिलन के मेरे सारे अरमानों पर पानी फिरता नजर आ रहा था.

अब आगे बहू सेक्स की कहानी:

आधे से ज्यादा मेहमान तो वरमाला होते रात में ही निकल लिए थे; बस वर वव्हू पक्ष के कुछ नजदीकी खास रिश्तेदार ही विदाई होने की प्रतीक्षा में रुके हुए थे.

इस तरह विदाई सुबह सात बजे ही हो गई उसके बाद बोरियत सी होने लगी थी.

अदिति की फ्लाइट दिल्ली से शाम सात बजे की थी तो हमें भी जल्दी ही निकलना था क्योंकि मुझे बहूरानी को स्टेशन तक छोड़ने तो जाना ही जाना था.
उसके बाद ग्वालियर से दिल्ली तक की रेल यात्रा करीब पांच घंटे की होती है.

तो मैंने अदिति को चलने का इशारा किया और मैंने भी अपना सामान समेट कर बैग में भर लिया.

मेरा मन खिन्न सा हो रहा था; इतनी उम्मीद से आया था कि बहूरानी को जी भर के प्यार करने को मिलेगा, उनकी चूत सवा साल बाद चोदने को मिलेगी.

पर यहाँ तो चुदाई की कोई पोसिबिलिटी ही नज़र नहीं आ रही थी.

अब मुझे अपनी पत्नी रानी पर भी गुस्सा आने लगा था कि उसने भावुक होकर नींबू का अचार मुझे पकड़ा कर ग्वालियर रवाना कर दिया; और मैं भी कैसा नासमझ कि बहूरानी की चूत मारने के दिवा स्वप्न देखता हुआ यहां शादी में आ पहुंचा.

अब जो भी हो, जो हुआ सो हुआ, ऐसे सोच कर मैंने अपने मन को समझाया और अपना सामान पैक कर बैग रेडी करके निकलने के लिए अदिति की प्रतीक्षा करने लगा.

उधर मैरिज गार्डन वाला अलग से सबको हड़का रहा था कि जल्दी खाली करो क्योंकि अगली पार्टी की बुकिंग नौ बजे से है.

थोड़ी ही देर बाद मैंने देखा कि उधर सामने से बहूरानी भी अपना ट्राली बैग चलाते हुए मेरी तरफ ही आ रही थी.

“पापा जी चलो चलें! और ये आपका मुंह क्यों उतरा उतरा सा है? क्या हुआ?” बहूरानी मुझे गौर से देखते हुए बोली.
“अरे नहीं तो ऐसा कुछ नहीं है बेटा, चल अब चलें!” मैंने अपने मनोभावों को भरसक छिपाते हुए कहा.

“पापा जी, दिल छोटा नहीं करते, मैं अभी भी आपके साथ हूं न!” बहूरानी ने कहा तो एक बारीक सी मुस्कान उनके होंठों पर खेल गयी.

“अदिति बेटा … ‘तू अभी भी मेरे संग है’ … इसका मतलब?” मैंने उलझन भरे स्वर में पूछा.
“वो कुछ नहीं पापा … ऐसे ही कह दिया, चलो यहां से तो निकलें, ट्रेन का टाइम हो रहा है.” वो बोली.

वहां मैरिज गार्डन के सामने से हमने एक ऑटो रिक्शा लिया और स्टेशन जा पहुंचे.

बहुरानी का कथन कि ‘मैं अभी भी आपके साथ हूं न’ एक पहेली सा बन मेरे दिमाग को चकरघिन्नी बना रहा था.
पर इन ख्यालों को मैंने दिमाग से झटक दिया कि चलो जो होगा सामने आ जाएगा.

स्टेशन पहुंच कर मैंने प्लेटफोर्म टिकट लिया और अन्दर जाकर ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगा.

दिल्ली वाली ट्रेन भी नियत समय पर आ पहुंची.
बहूरानी का रिजर्वेशन सेकेण्ड ऐ सी में था, मैंने उन्हें उनके कोच में चढ़ा दिया और हैप्पीजर्नी विश करके बाय करने लगा.

“पापा जी आप भी अपना बैग लेकर जल्दी से अन्दर आओ!” बहूरानी व्यग्र स्वर में बोली.
“अरे बेटा, मुझे दिल्ली की तरफ थोड़े ही जाना है तू जा, मेरी नागपुर वाली ट्रेन एक घंटे के बाद है!” मैंने कहा.

“पापा जी, जल्दी करो ट्रेन चलने वाली है, आप को मेरे साथ ही चलना है.” बहूरानी ने उतावलेपन से कहा.
“अदिति बेटा …. मेरा टिकिट तो दूसरी ट्रेन का है …. विदाउट प्रॉपर टिकिट हाउ कैन आई बोर्ड डिस ट्रेन?” मैंने पूछा.

“पापा जी, कहा तो था कि मैं हूं न …. जल्दी आओ विदाउट टिकट चलने में भी कोई फांसी नहीं लगेगी, जुर्माना लगेगा तो हम भर देंगे.” बहूरानी ने आग्रहपूर्वक कहा.

मैंने भी ज्यादा बहस नहीं की और मैं अपना बैग लेकर ट्रेन में सवार हो गया और ट्रेन चल पड़ी.

सेकंड ऐ सी कोच में लोअर बर्थ पर बहूरानी मुझसे सट कर बैठी थी.
एक जमाने के बाद मुझे अदिति के इतने निकट बैठने का मौका मिला था.

मैरिज गार्डन से निकल कर यहां आते आते मुझे पसीना आने लगा था; ऐ सी की ठण्डी ठण्डी हवा और साथ में सट कर बैठी बहूरनी के जिस्म की आंच एक अजीब सा सुखद अनुभव दे रही थी.

ट्रेन चलते ही सबसे पहले मैंने अपना नागपुर जाने वाले टिकिट कैंसिल किया.

‘पापा जी मैं आपके साथ हूं न …’ यह कुछ शब्द अभी भी मेरे मन में कौतुहल मचा रहे थे … क्या है इन शब्दों का अर्थ?
क्या बहूरानी ने यहीं ट्रेन में चुदवाने का कुछा सोचा रखा है?
क्योंकि ग्वालियर से दिल्ली का सफ़र तो लगभग पांच घंटों का होगा. इतने टाइम में चुदाई के कम से कम दो राउंड तो बड़े आराम से लग सकते हैं; पर होगा कैसे??

मैंने बहूरानी की ओर देखा वो मेरे कंधे पर सिर रखे ऊंघने लगीं थीं.

“अदिति बेटा … क्या हुआ … नींद आ रही है?” मैंने बहूरानी की जांघ हौले को हौले से सहलाता हुआ अपनी हथेली ऊपर चूत तक लेजाकर वहां दबा दिया.

“सोने दो न पापा जी, और मत सताओ. मैं तो पहले ही गीली हो रही हूं ऊपर से रात भर से सोई नहीं; मुझे और मत छेड़िए.” बहूरानी फुसफुसाकर बोली और खिसक कर मेरी गोद में सिर रख कर लेट गयीं और अपने पांव मोड़ लिए.
अब मेरा लंड बहूरानी की सिर के नीचे दबने लगा था.

“अदिति बेटा, मैंने तो अभी तक कुछ किया ही नहीं फिर तू ऐसे कैसे अपनी पैंटी भिगो बैठी?” मैंने सिर झुका कर उसके कान में धीमे से हंसी करते हुए कहा.
“पापा, अब जो भी हो पर ये सब हुआ आपके आने के बाद ही … अब आप हंसो मत मुझे सोने दीजिये बस!” वो बोली.
और उसने अपनी साड़ी का आंचल अपने सिर पर ओढ़ लिया.

मैं भी इस अजीब से असमंजस भरी सिचुएशन में अदिति के सिर को थपकी देता हुआ खुद भी ऊंघने लगा.
सामने की बर्थ पर बैठे दो सज्जन हमें अजीब से नज़रों से ताड़ रहे थे. पर मैंने उन्हें अनदेखा करते हुए बहु को अपनी गोद में सुलाने का क्रम जारी रखा.

कुछ ही देर बाद हमारी ट्रेन के बगल से दिल्ली से आती हुई कोई राजधानी एक्सप्रेस धड़धड़ाती, हॉर्न बजाती हुई क्रॉस हो गयी.
उस क्षण मुझे अदिति के साथ बिताये हुए वो लम्हें सहसा स्मरण हो आये जब मैं और अदित ऐसी ही राजधानी एक्सप्रेस के ऐ सी फर्स्ट कोच में कभी बंगलौर से निजामुद्दीन, दिल्ली तक की यात्रा की थी; उन छत्तीस घंटों में मैंने बहूरानी का नंगा जिस्म कितनी बार भोगा था अब तो याद भी नहीं!

जिन पाठकों ने वो कहानी
ससुर और बहू की कामवासना
यहां पढ़ी होगी उन्हें अवश्य याद आ रहा होगा.

रात के उस अंधेरे में मैं बहू की चूत में लंड घुसाए यूं ही लेटा हुआ उनके होंठ चूसता रहता था, उनके गाल काटता रहता था.
और जब ट्रेन किसी छोटे स्टेशन से हॉर्न देती हुई पटरियां बदलती हुई क्रॉस होती तो वो खटर खटर जैसी जादुयी आवाज हमारे जिस्मों में नया जोश जगा जाती.
मैं पूरे वेग से उछल उछल कर उनकी चूत में लंड पेलने लग जाता था और बहू भी भयंकर चुदासी होकर अपनी गांड उछाल उछाल कर मेरे धक्कों का प्रत्युत्तर देती.
फिर थक कर अपने पांव मेरी कमर में लपेट कर मुझे चूमती हुई अपने बाहुपाश में कैद कर लेती थी.

यही सब सोचते सोचते मैं भी ऊंघने लगा और एक झपकी ले ली.

अचानक बहूरानी ने मुझे झिंझोड़ कर जगाया.
“पापा जी, जागिये, हमें यहीं उतरना है.” बहूरानी मुझे हिला हिला कर कह रही थी.

मैंने आंखें मलते हुए बाहर की तरफ देखा तो ट्रेन आगरा स्टेशन पर खड़ी थी.
“अदिति बेटा, ये दिल्ली नहीं है अभी तो आगरा आया है; चल परेशान मत हो, मुझे सोने दे.” मैंने बहू को अलसाए स्वर में कहा.

“पापा जी, हमें यहीं आगरा में ही उतरना है, चलो जल्दी उठिए और बाहर निकालिए, ट्रेन यहां बहुत कम समय को रूकती है.” बहुरानी अपना ट्राली बैग सँभालती हुई बोली.

अदिति का ये अप्रत्याशित व्यवहार मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उसके मन में चल क्या रहा है.
मैं दिमाग में यही असमंजस लिए उठा और अपना बैग टांग कर अदिति का बैठ भी संभाल लिया और हम ट्रेन से उतर गए और सामने एक बेंच पर जा बैठे.

“अदिति बेटा, यहां क्यों उतर गयी? तेरी फ्लाइट नहीं मिलने वाली अब आखिर तेरे मन में चल क्या रहा है, तेरा प्लान कुछ समझ ही नहीं आ रहा.” मैंने उलझन भरे स्वर में पूछा.

“मेरे प्यारे पापा जी, कल रात से ही आपका खराब मूड देख रही थी सो मैंने अपना सारा प्लान बदल दिया है, मैंने अपनी फ्लाइट रात में ही ऑनलाइन कैंसिल कर दी थी और कल की फ्लाइट ले ली थी. सोचा कि आपको ताजमहल की सैर करवा ही दूं; आज का दिन और आज की रात जी भर के मनमानी कर लो; अब तो खुश पापाजी?” बहूरानी अपने बालों की लट अपनी उंगली में लपेटते हुए बोली.

“अरे सच! तेरी तो क्या बात है बेटा; दिल खुश कर दिया तूने तो!” मैं बोला.
और अपना हाथ बहूरानी की जांघ पर रख दिया और वहीँ रखे रहने दिया, फिर सहलाने लगा.

“पापा जी, अभी मत छेड़ो मुझे, मैं पहले ही गीली हो रही हूं; होटल के रूम में जो चाहो सो कर लेना.” बहूरानी ने दायें बाएं देखा और मेरा लंड पैंट के ऊपर से ही सहला दिया फिर मेरे हाथ को दबा कर उसे अपनी जांघ पर से हटा दिया.

फिर बहूरानी अपने फोन से किसी का नंबर डायल कर बात करने लगीं; अंग्रेजी में हुई उस वार्तालाप का सारांश इतना है कि अदिति ने किसी होटल में रूम भी ऑनलाइन बुक किया हुआ था और उसी होटल के कस्टमर केयर से अपने पहुंचने की सूचना दे रहीं थीं.

“पापा जी, चलो स्टेशन से बाहर निकलते हैं होटल की गाड़ी आती ही होगी वो हमें होटल छोड़ देगी.” बहूरानी ने अपना हैण्डबैग अपने कंधे पर टांगते हुए कहा.
“हां बेटा चलो यहां से तो निकलते हैं.” मैंने कहा और बहूरानी की कार्यकुशलता की मन ही मन तारीफ़ करता हुआ बैग्स संभाल कर चल दिया.

आगरा स्टेशन से निकल हम होटल की कार में सवार हुए और चल दिए.
रास्ते में मैंने अदिति की जांघ पर हाथ रख कर सहलाने लगा और साड़ी के ऊपर से ही उनकी चूत को छेड़ने का यत्न करने लगा.

“मत छेड़िए पापा जी, मैं पहले ही गीली चिपचिपी होकर अजीब सा फील कर रही हूं आप और छेड़ोगे तो मैं यहीं कार में ही झड़ जाऊंगी; कुछ तो सब्र कर लीजिये; सारी रात अपनी ही है. आप अपने सारे अरमान निकाल लेना रात में!” बहूरानी बोली.
और मेरा हाथ अपनी जांघ पर से परे हटा दिया और गहरी गहरी सांसे लेते हुए खुद पे काबू पाने लगी.

जल्दी ही हम होटल जा पहुंचे, होटल की भव्य आलीशान बिल्डिंग दूर से देखने से ही अपने स्टार स्टेटस को सार्थक कर रही थी.
रिसेप्शन पर जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद हम सेवेंथ फ्लोर पर स्थित अपने रूम में जा पहुंचे.

रूम में पहुंचते ही मैंने बैग्स को तरफ फेंक कर रूम भीतर से लॉक कर के अदिति को भी अपने बाहुपाश में लॉक कर लिया और उसे बांहों में लिए बेड पर गिरा कर उनके स्तन दबोच कर उन्हें चूमने चाटने लगा.

होटल के रूम में पहुंचने के पांच सात मिनट के भीतर ही हम दोनों के कपड़े फर्श पर पड़े थे और हमारे मादरजात नंगे जिस्म बेड पर एक दूजे से लिपटे पड़े थे.

मैंने बहूरानी के दोनों मम्मे कस के दबोच रखे थे और पागलों की तरह उन्हें चूमे जा रहा था.

अदिति के कामुक जिस्म की उत्तेजना, उसकी चुदने की लालसा उस पर इस कदर हावी थी कि उसने फोरप्ले करने तक में रूचि नहीं दिखाई.

“पापा जी, ये सब बाद में कर लेना … अभी तो आप आ जाओ जल्दी से!” बहूरानी भयंकर कामुक स्वर में बोली.

और अपने पांव ऊपर उठा कर मेरे लंड के सुपारे को अपनी झंटियल चूत के खांचे में चार पांच बार ऊपर से नीचे रगड़ कर लंड को अपनी चूत के प्रवेश द्वार पर दबा दिया और हल्के से अपनी कमर को उचकाया.
तो मेरा सुपारा सट्ट से उसकी गीली चूत में निर्विघ्न प्रवेश कर गया और उसके मुख से एक आनंदभरी आह निकल गई.

“पापा जी, अब धकेल दो पूरा एक ही बार में …” बहूरानी मेरे नितम्बों को अपनी मुट्ठी में भर कर मसलती हुई बोली.
“अदिति बेटा, पहले मुझे अपने ताजमहल के दर्शन तो कर लेने दे ना, तेरी चूत देखे हुए सवा साल से ऊपर हो गया.” मैंने उसे चूमते हुए कहा.

“पापा जी, देख लेना सब देख लेना, सारी रात है आपकी जो चाहो जैसे चाहो सो कर लेना पर अभी तो जल्दी से चोदो मुझे प्लीज …” बहूरानी मिसमिसाती हुई बोली और अपनी कमर फिर से बेहद कामुक अश्लील अंदाज़ में उचकाई.

मैंने भी उसकी व्याकुलता को समझते हुए अपने दांत भींच कर लंड को जरा सा बाहर की ओर निकाला फिर पूरे दम से बहू की चूत में पेल दिया और उसे पूरे दम से चोदने लगा.

अब न उसे सब्र था न मुझे; सो चुदाई का वो द्वन्द्व युद्ध सात आठ मिनट से ज्यादा न चल पाया और मेरे लंड से रह रह कर वीर्य की पिचकारियां से छूटने लगीं.

अदिति ने भी झड़ते हुए मुझे अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसकी चूत मेरे लंड को दबा दबा कर सिकुड़ने लगी और वीर्य की एक एक बूंद दुहने लगी.

फिर बहू की चूत ने मेरे लंड से एक एक बूंद निचोड़ कर खुद सिकुड़ गयी और लंड को बाहर धकेल दिया.

चुदाई का वो प्रेलिमिनरी राउंड ख़त्म होने के बाद हम दोनों कितनी ही देर तक बीते लम्हों का रसास्वादन करते रहे और अपने बेतरतीब धड़कते दिलों को काबू करने का यत्न करते रहे.

“आई लव यू पापा …” बहूरानी बोली और अपनी उँगलियों से मेरे बालों में कंघी सी करने लगी.
“अदिति बेटा, आई लव यू टू!” मैंने बहू के दोनों मम्में दबोच कर कहा और उनके दोनों गाल चूम लिए.

“चलो पापा जी, अब उठो और रेडी हो जाओ. जब आगरा आ ही गए हैं तो वो संगमरमर वाला ताजमहल भी देख ही आते हैं.” बहू बोली.
“ओके डियर …. चलो देख ही आते हैं, यहां आकर भी ताजमहल नहीं देखा तो एक पछतावा सा होता रहेगा.” मैंने अपना लंड बहू के पेटीकोट से पौंछते हुए कहा.

फिर बहू ने अपना बैग खोल कर कपड़े निकाले और गांड मटकाती हुई नंगी ही वाशरूम में नहाने चली गयी.

नहाकर वो नंगी ही बाहर निकली.

इस बार वो अपनी झांटें रिमूव करके आयीं थीं तो उसकी सफाचट चूत दमक रही थी और उसके बदन से उठती शावर जैल की महक से रूम रूमानी हो उठा था.
उसका दमकता निर्वस्त्र हुस्न देखकर मेरे लंड ने तुरंत संज्ञान लिया और महाशय सिर उठा कर बहू की जाँघों के बीच निहारने लगे.

“पापा जी, अपने हथियार को काबू में रखिये और आप भी जल्दी से नहा कर आईये; फिर निकलते हैं. मुझे तो अब जोर की भूख भी लगने लगी है.” बहूरानी ने अपनी ब्रा कमर में लपेट कर उसका हुक सामने से बंद कर, फिर ब्रा को नचा कर आगे पेट की तरफ किया फिर स्ट्रेप्स को कंघों पर चढ़ाते हुए मम्मों को ब्रा के कप्स में कैद करते हुए बोली.

मैं उसका वो रूप निहारते हुए वाशरूम में जा घुसा.

जब मैं नहा कर आया तो बहूरानी तैयार खड़ी थी.
उसने टाइट जीन्स और ढीला सा टॉप पहन रखा था जिसमे से उनके मम्मों का जानलेवा उभार साफ साफ चुनौती देता सा खड़ा था.

कुल मिला कर बहूरानी इस वेश में इक्कीस बाईस साल की किसी कॉलेज की सेकेण्ड इयर की स्टूडेंट जैसी लग रही थी.

अदिति का टॉप जीन्स से दो अंगुल करीब ऊंचा था जिससे उनकी नंगी कमर अलग ही जलवा दिखा रही थी.

मैं तो अवाक् सा मुंह बाये उनके इस अनोखे रूप को देखता ही रह गया.

“हैल्लो पापा जी, कहां खो गए?” अदिति मेरी आँखों के सामने अपना हाथ लहराते हुए बोलीं.

मैं तो जैसे फिर से होश में आया.
“कुछ नहीं बहू, तुझे जीन्स टॉप पहने हुए पहली बार देखा न तो तेरे हुस्न के जादू में खो गया था, सच में तू इतनी सुन्दर और कमसिन सी लग रही है जैसे किसी कॉलेज की सेकेण्ड इयर की स्टूडेंट हो!” मैंने उसके मम्मों को निहारते हुए कहा.

“सच्ची में पापा जी? मैं इतनी छोटी सी लग रही हूं न!” बहूरानी खुश होते हुए बोली.
“हां बेटा तू सच्ची मुच्ची में एकदम वैसी ही लग रही है.” मैंने कहा और अपनी बांहें फैला दीं.

बहूरानी भी जैसी किसी प्रेमातुर प्रेमिका की तरह शर्माती हुई मेरे करीब आई और मेरे गले में अपनी बांहों का हार पहिना कर मेरे सीने से लग गयी.
उसके भारी उन्नत उरोजों का दबाव मुझे मेरे सीने पर महसूस होने लगा.

मैंने भी उसे अपने बाहुपाश में कैद कर लिया और उसे चूमने लगा.

“हटो पापा जी, ये सब करने को तो सारी रात पड़ी है, चलो मुझे भूख लगी है.” अदिति बोली.

इस तरह हम दोनों तैयार होकर कमरे से निकले और वहीँ होटल के रेस्टोरेंट में लंच कर टैक्सी लेकर ताजमहल देखने निकल लिए.

ताजमहल तो खैर अच्छा लगना ही था सो लगा.
हमें वहां घूमते हुए कोई तीन घंटे लग गए.

ताजमहल देखने तरह तरह के देसी विदेशी सैलानी अपने अपने रंग में मस्त एन्जॉय कर रहे थे.
मुझे तो वे विदेशी सुंदरियां लुभा रहीं थीं जो किसी पोर्न स्टार की तरह चड्डी नुमा निक्कर और टॉप पहने हुए अपने जिस्म की नुमाइश करती डोलतीं फिर रहीं थीं.

उन्हें देख देख कर मुझे लगता कि इनकी चूत भी ब्लू फिल्म्स की सुन्दरियों की तरह गुलाबी मक्खन जैसी होगी जो हाथ भर लम्बा मोटा लंड अपनी छोटी सी चूत में बड़े आराम से झेल लेती है.

इधर मेरी बहूरानी भी किसी से कम नहीं लग रही थी. जो उसे देखता वो देखता ही रह जाता. मेरी बहू सेक्स की गुड़िया लग रही थी.

उस जीन्स टॉप में से बहू की भरपूर जवानी जहां तहां से झांक रही थी.
टॉप और जीन्स के बीच जो फासला था उसमें से बहू की गुलाबी चिकनी कमर की झलक, उनके चलने से जांघों के जोड़ पर बनते त्रिभुज से उनकी कचौरी जैसी फूली चूत का सहज ही आभास होता था.

कुल मिला कर बहूरानी की जवानी, उनके तन के जानलेवा उभार, गहराइयां, घाटियां और चोटियां किसी हर किसी के तन मन में हलचल मचाये हुए थीं.

ताजमहल से लौटते हुए रास्ते में अदिति ने पेठा, दालमोंठ वगैरह खरीदे.
मार्किट में घूमते हुए हमलोग अंधेरा होने पर होटल लौटे.
मेरी बहू सेक्स की कहानी पर अपने विचार मुझे मेल करें.

बहू सेक्स की कहानी का अगला भाग: मेरी बहू रानी को पुनः भोगने की लालसा- 3

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